मऊगंज, मध्य प्रदेश।
मध्य प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। मऊगंज के बघैला गाँव में प्रशासनिक लापरवाही और डॉक्टर की बेरुखी ने एक 60 वर्षीय बुजुर्ग की जान ले ली। इस दिल दहला देने वाली घटना ने न केवल स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं?

एंबुलेंस नहीं मिली, ग्रामीणों ने कीचड़ में खटिया पर घसीटकर लाया मरीज

यह दर्दनाक हादसा हनुमना जनपद के बघैला गाँव का है। 60 वर्षीय अशोक सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ी। परिजनों ने सुबह 9:10 बजे से एंबुलेंस के लिए कॉल करने शुरू किए, लेकिन कई कॉल्स के बावजूद 11 बजे तक भी कोई एंबुलेंस नहीं पहुंची। ड्राइवर ने जवाब दिया – "गाँव तक पहुंचने में दो घंटे और लगेंगे।"

थक-हारकर ग्रामीणों ने खुद पहल की। उन्होंने अशोक सिंह को खटिया पर लिटाया, तिरपाल में लपेटा और कीचड़ से भरे पगडंडी रास्ते से घसीटते हुए सड़क तक लाए। वहाँ स्थानीय युवक मनीष मिश्रा ने मानवता दिखाते हुए अपनी निजी गाड़ी से उन्हें मऊगंज अस्पताल पहुंचाया।

डॉक्टर का असंवेदनशील रवैया: "यह कोई धर्मशाला नहीं है" कहकर अस्पताल से भगाया

मऊगंज अस्पताल में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला दृश्य सामने आया। परिजनों के अनुसार, ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर पंकज पांडे ने न तो मरीज को ठीक से देखा, न जांच की, और न ही भर्ती करने की प्रक्रिया अपनाई। उन्होंने कथित रूप से कहा,
"आप टीवी (टीबी) के मरीज हैं, इलाज आशा कार्यकर्ता से करवाइए, यह कोई धर्मशाला नहीं है।"

न कोई प्राथमिक उपचार, न पर्ची पर रेफर — बल्कि परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर ने रेफर पर्ची फाड़ने की धमकी तक दी। अस्पताल से लौटने के कुछ देर बाद ही अशोक सिंह की मौत हो गई।

स्वीकृत लापरवाही, लेकिन कार्रवाई पर चुप्पी

ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) प्रद्युम्न शुक्ला ने घटना की पुष्टि करते हुए स्वीकारा कि "मरीज को भर्ती नहीं किया गया, रेफर भी नहीं किया गया।" उन्होंने मामले की जांच की बात तो कही, लेकिन अब तक किसी भी जिम्मेदार पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।