मुंबई,: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भाजपा की पूर्व प्रवक्ता आरती साठे को महाराष्ट्र हाईकोर्ट का जज नियुक्त किए जाने के बाद राज्य में एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों और कई कानूनी विशेषज्ञों ने इस नियुक्ति की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।


 

राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर आपत्ति

 

आरती साठे, जो लंबे समय तक भाजपा की प्रवक्ता और पार्टी संगठन में सक्रिय रही हैं, उनकी जज के तौर पर नियुक्ति को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई जा रही हैं। आलोचकों का कहना है कि किसी राजनीतिक पद पर रह चुकी महिला को न्यायपालिका जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करना न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। विपक्षी दलों का तर्क है कि इस तरह की नियुक्तियां न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती हैं।


 

भाजपा का पक्ष

 

इस विवाद पर भाजपा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि आरती साठे ने साल 2024 में ही पार्टी के सभी संगठनात्मक और प्रवक्ता पदों से इस्तीफा दे दिया था। पार्टी का दावा है कि नियुक्ति के समय उनका कोई भी राजनीतिक जुड़ाव नहीं था। उनका कहना है कि साठे एक योग्य और अनुभवी वकील हैं, और उनकी नियुक्ति उनकी कानूनी योग्यता के आधार पर हुई है, न कि उनके राजनीतिक इतिहास के कारण।


 

न्यायपालिका भी बहस का केंद्रइस घटना ने एक बार फिर से न्यायपालिका और कॉलेजियम प्रणाली को बहस के केंद्र में ला दिया है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कॉलेजियम को इस मामले पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि एक जज की निष्पक्षता पर संदेह नहीं होना चाहिए। यह मामला अब राजनीतिक गलियारों से लेकर न्यायिक हलकों तक चर्चा का विषय बन गया है।