स्थानांतरण के एक महीने बाद भी पद पर बने हुए जिला शिक्षा अधिकारी; लोकायुक्त जांच प्रभावित होने की आशंका
जबलपुर: जबलपुर के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) का स्थानांतरण एक महीने से अधिक समय से लंबित है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। सरकार के आदेशों की अनदेखी करते हुए अधिकारी अभी भी अपने पद पर बने हुए हैं, जबकि उन्हें 6 जून, 2025 को सचिव, मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड, भोपाल के रूप में स्थानांतरित किया गया था। इस मामले ने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि उनके खिलाफ चल रही एक महत्वपूर्ण लोकायुक्त जांच को प्रभावित करने की आशंका भी बढ़ गई है।
लगभग तीन दशकों से जबलपुर में पदस्थ
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि संबंधित अधिकारी पिछले साढ़े चार साल से जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर हैं और उससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि वे पिछले 27 सालों से जबलपुर जिले में ही विभिन्न पदों पर पदस्थ रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें प्रशासनिक फेरबदल के तहत भोपाल भेजा है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, वे इस स्थानांतरण को रुकवाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। उनका लंबे समय से एक ही जिले में बने रहना भी अब चर्चा का विषय बन गया है, जिससे उनकी कार्यप्रणाली पर संदेह गहराता जा रहा है।
लोकायुक्त जांच और पदमुक्त न होने का गहरा संबंध
सबसे बड़ा विवाद यह है कि अधिकारी के खिलाफ लोकायुक्त में भ्रष्टाचार से संबंधित एक गंभीर शिकायत की जांच वर्तमान में जबलपुर में ही चल रही है। यह जांच आयुक्त, लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल के निर्देश पर प्राचार्य एवं संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण संभाग जबलपुर द्वारा की जा रही है।
प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अधिकारी को पद से हटाया नहीं जाता, वे इस जांच को प्रभावित कर सकते हैं। चूंकि जांच उनके ही अधिकार क्षेत्र में हो रही है, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों पर दबाव बनाने की आशंका बनी रहती है। जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें तत्काल पदमुक्त किया जाए।
स्थानांतरण आदेश जारी होने के एक महीने से अधिक समय बाद भी उनका पद पर बने रहना न केवल सरकारी नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कुछ प्रभावशाली शक्तियां उन्हें बचाने की कोशिश कर रही हैं। इस स्थिति ने शिक्षा विभाग और पूरे प्रशासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
क्या उच्च अधिकारी लेंगे संज्ञान?
यह मामला अब उच्च अधिकारियों के संज्ञान में है और उम्मीद है कि इस पर जल्द ही कोई ठोस निर्णय लिया जाएगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार अपने ही आदेशों का पालन करवा पाती है या नहीं। जबलपुर के शिक्षा जगत में इस बात को लेकर भी चिंता है कि एक तरफ शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक शिथिलता का यह उदाहरण सामने आ रहा है। यह मामला दर्शाता है कि प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना किस हद तक हो सकती है, जिससे सरकारी जांचों की निष्पक्षता भी खतरे में पड़ सकती है।
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