मैहर, सतना।
"जहाँ चाह वहाँ राह" – इस कहावत को साकार किया है मैहर के ग्राम पोड़ी निवासी अशोक विश्वकर्मा (उम्र 56 वर्ष) ने। अशोक जी मा शारदा मंदिर समिति में कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं, लेकिन उनकी असली पहचान एक ऐसे कलाकार के रूप में बन रही है जो अनुपयोगी नारियल की ढोकली से सुंदर एवं उपयोगी वस्तुएँ बनाकर लोगों को चकित कर रहे हैं।

मंदिर में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद के रूप में आए नारियल को तोड़ने के बाद उसकी बची हुई ढोकली को आमतौर पर फेंक दिया जाता है। लेकिन अशोक जी ने अपनी रचनात्मक सोच और मेहनत से इनको नया जीवन दे दिया। वे इन नारियल की ढोकलियों से चाय के कप, ग्लास, कटोरी, जग, पेन स्टैंड, ऐश ट्रे, फोटो फ्रेम, फ्लावर पॉट और पक्षियों की आकृति जैसी अनोखी वस्तुएँ बना रहे हैं।

ऐसे मिली प्रेरणा:
अशोक जी ने बताया कि एक दिन नारियल की ढोकली उन्हें पानी पीने के गिलास जैसी लगी। उन्होंने उसे साफ करके प्रयोग किया और वहीं से उन्हें विचार आया कि इसी से और भी चीज़ें बनाई जा सकती हैं। इसके बाद उन्होंने प्रयास करना शुरू किया और धीरे-धीरे अलग-अलग वस्तुएँ बनाना सीख लिया।

लोग कर रहे सराहना:
अशोक जी की कलाकृतियाँ लोगों को इतनी पसंद आईं कि उनसे चाय के कप-कैटल सेट, कटोरी सेट जैसी चीजों की मांग भी होने लगी। उनकी कलात्मकता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता लोगों का ध्यान खींच रही है।

पर्यावरण के लिए एक संदेश:
अशोक जी का मानना है कि भविष्य में लोग धातु और केमिकल युक्त वस्तुओं की जगह प्राकृतिक और देसी सामग्रियों को अपनाना पसंद करेंगे। नारियल की बेकार समझी जाने वाली ढोकली को ‘मेड इन इंडिया’ स्टार्टअप का आधार बनाकर उपयोगी वस्तुएँ तैयार की जा सकती हैं – जिसमें लागत नगण्य है और आवश्यकता केवल हुनर और सोच की है।

यह कहानी न केवल एक कलाकार की प्रतिभा की मिसाल है, बल्कि हमें यह भी सिखाती है कि कबाड़ को भी कला में बदला जा सकता है – बस नज़रिया और जज़्बा होना चाहिए।