अमेरिका में नई वीजा पॉलिसी और टैरिफ नियम छात्रों के लिए बन रहे चुनौती
नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई वीजा पॉलिसी और टैरिफ नियमों ने भारतीय छात्रों के लिए चुनौती बन गए हैं। पहले अमेरिका उच्च शिक्षा का केंद्र माना जाता था, अब वहां पढ़ाई महंगी, जटिल और जोखिम भरी हो गई है। 4 जुलाई 2025 को ट्रंप ने वन बिग ब्यूटीफुल बिल के तहत अमेरिका में छात्र वीजा के लिए एफ, एम और जे श्रेणी के आवेदकों को 250 डॉलर यानी करीब 21,463 रुपए की वीजा इंटीग्रिटी फीस और 24 डॉलर यानी करीब 2,060 रुपए की आई-94 फॉर्म फीस देने का आदेश दिया है। इसके अलावा छात्रों से उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की सार्वजनिक जानकारी मांगी जा रही है और उनकी गहन जांच की जा रही है। किसी भी प्रदर्शन या नियम उल्लंघन की स्थिति में वीजा रद्द होने का खतरा है।
नई पॉलिसी के मुताबिक छात्र वीजा की वैधता अब केवल 2 से 4 सालों तक सीमित की गई है। पहले छात्र अपनी पढ़ाई पूरी होने तक रुक सकते थे, लेकिन अब समयसीमा खत्म होने पर उन्हें एक्सटेंशन के लिए दोबारा प्रक्रिया से गुजरना होगा। वीजा इंटरव्यू की प्रतीक्षा भी अब लंबी हो गई है। चीन से आई रिपोर्ट्स बताती है कि वीजा इंटरव्यू की देरी से कई छात्र हतोत्साहित हैं और हांगकांग की यूनिवर्सिटीज में अमेरिकी ट्रांसफर रिक्वेस्ट की भरमार है।
ट्रंप प्रशासन का मकसद विदेशी छात्रों की संख्या कम करना है। कुछ छात्रों को राजनीतिक गतिविधियों के आरोप में वीजा रद्द कर देश छोड़ने को मजबूर किया गया है। कई मामलों में वीजा अपॉइंटमेंट्स अस्थायी रूप से रोक दिया गया है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह सख्ती अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। नेशनल एसोसिएशन फॉर फॉरेन स्टूडेंट्स अफेयर्स (एनएएफएसए) के मुताबिक इस फॉल सेमेस्टर में अमेरिका में विदेशी छात्रों की संख्या 30-40 फीसदी तक गिर सकती है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अनुमानित 7 बिलियन डॉलर यानी करीब 61,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। विदेशी छात्रों पर निर्भर कॉलेज संकट में हैं।
इस बदलाव का फायदा ब्रिटेन, हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया, यूएई और कजाकिस्तान जैसे देशों को मिल रहा है। ब्रिटेन अब भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका के बाद दूसरा पसंदीदा देश बन रहा है। यहां चीनी और अमेरिकी छात्रों की संख्या बढ़ रही है। खासकर बिजनेस और मैनेजमेंट कोर्सेज की मांग बढ़ी है। एशिया के देशों में वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज के सैटेलाइट कैंपस स्थापित हैं, जहां फीस अपेक्षाकृत कम है। हांगकांग में विशेष ऑफर दिए जा रहे हैं कि यदि अमेरिका में वीजा नहीं मिलता, तो छात्र वहीं शिफ्ट हो सकते हैं।
दुबई में पिछले साल विदेशी छात्रों की संख्या 33फीसदी बढ़ी है। वहीं कजाकिस्तान में भी अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं, जो खासकर चीनी और रूसी छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं। अगर ट्रंप की नीतियां जारी रहीं, तो आने वाले सालों में एशिया उच्च शिक्षा का नया वैश्विक केंद्र बन जाएगा। भारतीय छात्रों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय जरूर है, लेकिन साथ ही नए अवसरों के द्वार भी खोल रहा है।
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