सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में फिर गिरी फॉल सीलिंग, न्यूरो वार्ड में मचा हड़कंप — मरीजों की जान पर बना खतरा, निर्माण गुणवत्ता पर बड़े सवाल**
**150 करोड़ की लागत से बनी इमारत में बार-बार दोहराया जा रहा ‘सीलिंग हादसा’, स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में लापरवाही का आलम**
रीवा। विंध्य के सबसे बड़े सरकारी **सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल** में एक बार फिर लापरवाही का नमूना देखने को मिला है। तृतीय तल के **न्यूरो सर्जरी विभाग** में तड़के सुबह अचानक फॉल सीलिंग भरभरा कर गिर गई। हादसे के वक्त वार्ड में मरीज और उनके परिजन गहरी नींद में थे। टुकड़ों के साथ धूल-गर्द उड़ते ही वार्ड में चीख-पुकार मच गई और चारों ओर अफरा-तफरी फैल गई।
“नींद से जागे तो सिर के ऊपर छत टूट रही थी”
वार्ड में भर्ती एक मरीज के परिजन ने बताया, “हम सो रहे थे, अचानक जोर की आवाज आई… आंखें खुलीं तो ऊपर से सीलिंग के टुकड़े गिर रहे थे। भागते-भागते बाहर निकले।” गनीमत रही कि हादसे में किसी की जान नहीं गई, लेकिन **तीन से चार लोगों को मामूली चोटें** आई हैं। हादसे के तुरंत बाद सिक्योरिटी गार्ड और स्टाफ ने सभी मरीजों को दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दिया।
पांच साल पुरानी बिल्डिंग, कई बार दोहराया हादसा
यह अस्पताल अक्टूबर 2019 में **150 करोड़ रुपये** की लागत से तैयार हुआ था, लेकिन महज पांच साल में यह इमारत कई बार ‘फॉल सीलिंग गिरने’ की घटनाओं का गवाह बन चुकी है। इससे पहले **कार्डियोलॉजी विभाग के ऑपरेशन थिएटर**, **ग्राउंड फ्लोर की लिफ्ट के सामने** और **एक्स-रे कक्ष के पास प्रतीक्षालय** में भी सीलिंग गिरी थी। हर बार मरम्मत का आश्वासन मिला, लेकिन समस्या जस की तस रही।
मौसम का बहाना या निर्माण में खामी?
अस्पताल के अधीक्षक **अक्षय श्रीवास्तव** ने कहा कि बरसात के मौसम में उमस (ह्यूमिडिटी) बढ़ने से फॉल सीलिंग में नमी आ जाती है, जिससे यह टूटकर गिर जाती है। उन्होंने माना कि इस संबंध में पीडब्ल्यूडी को पहले भी कई बार लिखित शिकायत भेजी गई है, क्योंकि अस्पताल भवन का मेंटेनेंस पीडब्ल्यूडी के जिम्मे है।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि इतनी महंगी बिल्डिंग में महज पांच साल में बार-बार छत गिरना **गंभीर निर्माण खामी** का संकेत है, और केवल ‘ह्यूमिडिटी’ को वजह बताना मामले को हल्का करना है।
गृह जिले में ही ऐसी लापरवाही क्यों?
यह अस्पताल स्वास्थ्य मंत्री **राजेंद्र शुक्ल** के गृह जिले में स्थित है। इसके बावजूद यहां बार-बार ऐसे हादसे होना सरकारी सिस्टम की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। न तो निर्माण एजेंसी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही अब तक स्थायी मरम्मत का समाधान निकल पाया।
अभी भी खतरा बरकरार
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते भवन की संपूर्ण जांच और मरम्मत नहीं हुई तो भविष्य में बड़ा हादसा हो सकता है। खासकर न्यूरो और कार्डियोलॉजी जैसे संवेदनशील वार्डों में यह समस्या जानलेवा साबित हो सकती है।
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