सतना: यह सजा कब सुकून में बदल गई पता ही नहीं चला है। यह कहना है सतना सिटी कोतवाली के थाना प्रभारी रावेंद्र द्विवेदी का है। जिन्हें हाईकोर्ट ने एक मामले में नोटिस तामील न करा पाने की चूक पर 62 दिनों में 1000 फलदार पौधे लगाने की सजा सुनाई थी। लेकिन प्रकृति के प्रति उनका लगाव ऐसा जागा कि उन्होंने यह काम महज 32 दिनों में ही पूरा कर दिया है। अब सजा पूरी होने के बाद भी उनका यह मिशन रुका नहीं है और वे मंदाकिनी नदी के तट को हरा-भरा करने में जुटे हुए हैं।

क्या था पूरा मामला?

दरअसल, जून माह में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक मामले में समय पर नोटिस तामील न होने पर कोतवाली टीआई रावेंद्र द्विवेदी को फटकार लगाते हुए एक अनोखी सजा सुनाई थी। उन्हें 1 जुलाई से 31 अगस्त के बीच चित्रकूट क्षेत्र में 1000 फलदार पौधे लगाने और उनकी जीपीएस लोकेशन के साथ तस्वीरें अदालत में पेश करने का आदेश दिया गया था।

सजा से शुरू जुनून पर खत्म

टीआई द्विवेदी ने 7 जुलाई से इस काम की शुरुआत की थी। उन्होंने बताया कि यह काम इतना भी आसान नहीं था। पहले मंदाकिनी नदी के किनारे मोहकमगढ़ में स्थानों का चयन किया गया। फिर पौधे लगाने के लिए गड्ढे खोदे गए, मिट्टी को दीमक आदि से उपचारित किया गया और पौधों की सुरक्षा के लिए पूरे क्षेत्र में तार की फेंसिंग कराई गई। हर पौधे को सीधा रखने के लिए डंडे का सहारा भी दिया गया।

62 दिनों की सजा 32 दिनों में की पूरी

वही, जैसे-जैसे पौधे लगते गये ठीक उसी तरह टीआई रावेंद्र द्विवेदी का प्रकृति से जुड़ाव गहराता गया है। नतीजा यह हुआ कि 62 दिनों का लक्ष्य उन्होंने मात्र 32 दिनों में यानी 4 अगस्त तक ही पूरा कर लिया है। उन्होंने इस दौरान आम, आंवला, कटहल, नींबू के पौधे लगाए हैं। बाड़ियों में किनारों पर नीम, पीपल और बरगद के पौधे भी लगाए गए है। 

कलेक्टर एसपी का जताया आभार

जिससे क्षेत्र में हरियाली और छांव दोनों का विस्तार होगा। पौधारोपण के लिए भूमि आबंटन का आवेदन स्वीकार करते हुए सतना एसपी की अनुशंसा पर कलेक्टर ने विशेष रूप से जमीन उपलब्ध कराई है।उसके लिए थाना प्रभारी ने सतना कलेक्टर सतीश कुमार एस और एसपी आशुतोष गुप्ता को धन्यवाद ज्ञापीत किया है।

पूर्व जन्म का मानता हूं पुण्य - टीआई

टीआई रावेंद्र द्विवेदी ने बताया कि पौधारोपण का यह अनुभव मेरे लिए आत्मिक संतोष देने वाला है। मैं इसे अपने पूर्व जन्म का पुण्य मानता हूं। पौधा केवल एक पौधा नहीं, बल्कि एक जीवन है।जिसे हमने पूरे मन और अंतरात्मा से स्वीकार कर पूरा किया है। उन्होंने आंगे बताया की भले ही लोग इसे सजा समझें लेकिन मुझे यह समझ में आया कि निश्चित ही कोई पुण्य रहा होगा कि मुझे यह अवसर मिला है।आपको बता दे कि सजा पूरी होने के बाद भी उनका यह अभियान जारी है। जो कर्तव्य के साथ पर्यावरण संरक्षण की एक मिसाल पेश कर रहा है।