उमरिया - जिले के विख्यात बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व मे बीते दिनों 10 से 12 व्यक्तियों को पतौर कोर परिक्षेत्र मे पीहरी लेने जाने पर वन विभाग द्वारा अवैध प्रवेश पर कार्यवाही करने के मामला तूल पकड़ता जा रहा है.
हाल ही मे पतौर एसडीओ भूरा सिंह गायकवाड़ और वन अमला की टीम ने प्रतिबंधित कोर क्षेत्र मे प्रवेश करते पाएं गए कुछ लोग को वन्यजीव अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है ऐसे मे कुछ राजनीतिक और ग्रामीण समाजिक लोगो द्वारा विरोध जताया जा रहा है उनका कहना है की यह गलत है की पिहरी लेने जंगल के अंदर जाने पर कार्यवाही उचित नहीं है यह ग्रामीणों का अधिकार है यहां तक की राजनितिक पृष्ठभूमि निभाने वालो ने यह तक कह दिया की जंगल क्षेत्र मे और भी अवैध गतिविधिया संचालित उन्हें क्यों नहीं पकड़ते या रोकते बात भी सही है ग्रामीणों का भी कहना है की हम आज का थोड़ी पिहरी बिन रहे है बहुत समय से ले रहे यह भी बात सौ प्रतिशत सही है लेकिन सवाल यह उठता है की यह जो व्यक्तियों का समूह एक साथ कोर एरिया मे प्रवेश कर बचकानी हरकत कर रहे थे कौन है,कहा से और किस गाँव के है अब तक यदि कोर मे प्रवेश को लेकर कार्यवाही पूर्व मे नहीं हुई है तो वन विभाग दोषी है क्योंकि वनजीव अधिनियम धारा 27  मे स्पष्ट तौर पर कोर क्षेत्र मे मानवीय गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित है और कई घटनाये भी हुई है जिसका हिसाब नहीं है जैसे की हिंसक जानवर के जैसे बाघ, तेंदुए या जंगली हाथियो और जंगली सूअर के हमले से कई लोग घायल हो चुके है या उन लोगो की मौत हो गई है यदि फिर हमला हो जाता तो कहते वन विभाग ने बचाया नहीं फिर एक नया नाटक हो जाता है मेरे कहने का तात्पर्य यह की नियम व्यक्तियों के लिए ही बनाये गए जंगल और वन्यजीव के सुरक्षा की जिम्मेदारी वन अधिकारी कर्मचारियों की है वे अपने कर्तव्य निभा रहे है तो इस पर गलत क़्या है.
 कोर क्षेत्र मे जा कर वन्यजीव के रहवास स्थल को नष्ट करते है यह पूर्णतः गलत है जानवर आप के घर नहीं आते है.. आप जाते हो..


  क़्या कहते है जिम्मेदार अधिकारी 
 
जब इस मामले को एसडीओ भूरा सिंह गायकवाड़ से बात किया तो उनका क़्या कहना है जाने उनका कहना 
यह मामला सामान्य वन मंडल या बफर जोन का नहीं जहाँ वन उपज का अधिकार क्षेत्रीय ग्रामीणों का रहता है बल्कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र के अंतर्गत व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र एवं हाथी प्रभावित क्षेत्र के अंतर्गत का है यह क्षेत्र पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद भी अलग-अलग ग्रामों से इतनी दूर से  जंगल  में अवैध प्रवेश कर  घूम फिर कर पिहरी को एकत्रित करना एवं वन्य प्राणियों का पीछा करना गलत नियत को उजागर करता है ।
       इस कार्य में ग्रामीणों के द्वारा अवैध प्रवेश करना  , पीहरी उखाड़ना जो की वन्य प्राणियों के हैबिटेट को नष्ट करना एवं वन्य प्राणी का पीछा करना अवैध शिकार की श्रेणी में आता है ।
 इस प्रकार से यह तीन प्रकार का अपराध इनके द्वारा किया गया है भारतीय वन्य जीव ( संरक्षण  )1972 अधिनियम  की विभिन्न धाराओं  का उल्लंघन हुआ है ।