जबलपुर। शहर की सड़कों पर आवारा मवेशियों का आतंक अब जानलेवा संकट बन चुका है। दिन-ब-दिन बढ़ रही दुर्घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। हालात यह हैं कि नगर निगम हर महीने लाखों रुपये खर्च कर रहा है, लेकिन मवेशियों की संख्या और दुर्घटनाओं में कोई कमी नहीं आ रही।

निगम का हांका गैंग सिर्फ कागजों पर सक्रिय

नगर निगम दावा करता है कि हांका गैंग रोजाना सड़कों से मवेशी पकड़ रही है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। सुबह-शाम शहर की मुख्य सड़कों पर बैठे और घूमते मवेशी इस लापरवाही की गवाही दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह कार्रवाई महज खानापूर्ति बनकर रह गई है।

कलेक्टर का आदेश भी बेअसर

जिला दण्डाधिकारी एवं कलेक्टर दीपक सक्सेना ने हाल ही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत आदेश जारी कर मवेशियों को सड़कों पर खुला छोड़ने पर प्रतिबंध लगाया था। उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान भी है। लेकिन आदेश के बावजूद स्थिति जस की तस है।

सूत्रों के अनुसार, हांका गैंग और पशुपालकों के बीच मिलीभगत भी इस समस्या की जड़ है। गैंग के आने की पहले से सूचना मिल जाने पर मवेशियों को छिपा दिया जाता है और बदले में कथित रूप से ‘दान-दक्षिणा’ दी जाती है।

सुविधाओं का अभाव, बढ़ी समस्या

नगर निगम चार कैटल वैन और कर्मचारियों की तैनाती का दावा करता है, मगर शहर में अब कांजी हाउस ही मौजूद नहीं है। पहले कांजी हाउस शहर के बीचोंबीच था, लेकिन अब दूर होने के कारण लोग मवेशियों को पकड़वाने में रुचि नहीं लेते। इससे समस्या और विकराल होती जा रही है।

कानूनी प्रावधानों का भी पालन नहीं

प्रतिबंधात्मक आदेश के अनुसार:

  • ग्राम पंचायत और नगरीय निकायों को मवेशियों की निगरानी व कार्रवाई की जिम्मेदारी है।

  • सड़क विभागों को मवेशियों को हटाने और मृत मवेशियों का निस्तारण करना है।

  • बीमार या विकलांग मवेशियों को सड़क पर छोड़ना प्रतिबंधित है।

  • उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 223, पशु क्रूरता अधिनियम 1960 और नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 358 के तहत दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

शहरवासियों की मांग

स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को चाहिए कि:

  • मवेशियों को खुला छोड़ने वाले पशुपालकों पर कठोर कार्रवाई की जाए।

  • शहर में पुनः कांजी हाउस स्थापित किए जाएं।

  • हांका गैंग की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच कराई जाए।

लोगों का स्पष्ट कहना है कि जब तक प्रशासन और निगम सिर्फ आंकड़ों और खानापूर्ति तक सीमित रहेंगे, तब तक सड़कों पर मौत का यह मूक खतरा मंडराता रहेगा।