जबलपुर। मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग (Madhya Pradesh State Information Commission) की लचर कार्यप्रणाली और सूचना आयुक्तों के खाली पड़े पदों को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में दायर तीन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) का उद्देश्य जनता को समय पर सूचना उपलब्ध कराना है, लेकिन आयुक्तों की कमी से यह अधिकार महज कागजी बनकर रह गया है। कोर्ट ने लंबित मामलों और खाली पदों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।


 

हाईकोर्ट में दाखिल याचिकाओं के प्रमुख आरोप

 

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि राज्य सूचना आयोग में स्वीकृत 10 पदों में से 6 सूचना आयुक्तों के पद लंबे समय से खाली हैं। इन पदों को भरने के लिए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है, क्योंकि RTI के तहत दायर अपील और शिकायतों पर सुनवाई नहीं हो पा रही है।

याचिका के अनुसार, वर्तमान में राज्य में RTI से संबंधित करीब 20,000 मामले लंबित हैं। कानून के मुताबिक, अपील पर 180 दिनों के भीतर सुनवाई होनी चाहिए, लेकिन आयुक्तों की कमी के कारण तीन-तीन सालों से ये मामले धूल फांक रहे हैं। इस देरी से आरटीआई एक्ट का मूल उद्देश्य ही विफल हो रहा है, जिससे आम जनता के संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है।


 

RTI एक्ट का उल्लंघन: जनता के अधिकार पर कुठाराघात

 

याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) जनता को सरकार से जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एक शक्तिशाली उपकरण है। लेकिन राज्य सूचना आयोग की वर्तमान स्थिति से यह टूल काम नहीं कर पा रहा है। सूचना नहीं मिलने से भ्रष्टाचार और कुशासन को बढ़ावा मिल रहा है।

हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि सरकार को इन पदों को तुरंत भरना चाहिए ताकि लंबित मामलों का निपटारा हो सके। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए जल्द ही एक तारीख तय की है और राज्य सरकार से इन सभी बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। इस मामले में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप राज्य में RTI के कार्यान्वयन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।