13 साल की उम्मीद मातम में बदलीः जुड़वा नवजातों की मौत पर परिवार ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप, स्वास्थ्य विभाग को शिकायत
जबलपुर। शादी के 13 साल बाद खजरी खिरिया निवासी रामराजदृवंदना पटेल के घर में जो खुशियाँ आईं, वे कुछ ही दिनों में काले बादल बनकर छा गयीं। 17 सितंबर 2025 को मातृम ऑर्थाे एंड गायनिक सेंटर में जन्मे जुड़वा पुत्र जन्म के तुरंत बाद स्वस्थ दिखे, लेकिन जन्म के कुछ ही घंटों बाद दोनों शिशुओं के पीले पड़ने (जौण्डिस) की शिकायत परिजनों ने डॉक्टर को बताई। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही और समय पर उपयुक्त उपचार न मिलने के कारण दोनों नवजातों की मौत हो गयी कृ परिवार ने इस बाबत जिला चिकित्सकीय अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई है और जांच की मांग की है।
डॉक्टर की लापरवाही से गई बच्चों की जानः परिवार
परिवार ने बताया कि 17 सितंबर की शाम दोनों शिशु हल्के-हलके पीले दिखे। परिजनों ने यह बात डॉ. सोनल रिछारिया को बताई, जिनके अनुसार डॉक्टर ने प्राथमिक रूप से बच्चों को धूप दिखाने की सलाह दी और उन्हें आश्वस्त किया कि बच्चे ठीक हो जाएंगे। 18 सितंबर को जब शिशुओं की हालत और अधिक पीली दिखने लगी तो परिजनों ने फिर से डॉक्टर से संपर्क किया और पीलिया (बिलिरुबिन) का टेस्ट कराया। रिपोर्ट मिलने के बाद बच्चों को गैलेक्सी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
परिवार के अनुसार उसी रात करीब 4रू30 बजे बड़े नवजात की अचानक मौत हो गयी। परिजनों का आरोप है कि गैलेक्सी हॉस्पिटल के स्टाफ ने शुरू में इस बात की जानकारी छिपायी और परिजन जब दबाव डालने लगे तो डॉक्टरों को बुलाया गया तथा मौत की पुष्टि की गयी। बाद में अस्पताल ने एक शिशु को नागपुर रेफर कर दिया गया, जहाँ अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि पीलिया की स्थिति गंभीर थी और यह दिमाग तक पहुँच चुकी थी। इलाज के प्रयासों के बाबजूद दूसरे शिशु की भी मृत्यु हो गयी।
परिवार ने अस्पताल और प्रसव में शामिल चिकित्सक डॉ. सोनल रिछारिया पर समय पर उचित परीक्षण और उपचार न करने का आरोप लगाया है। रामराज पटेल ने कहा कि 13 साल की प्रतीक्षा के बाद मिले संतान सुख को उन्होंने जीवन भर के लिए सँभाल कर रखा था, लेकिन अब दोनों बच्चों के चले जाने से परिवार बुरी तरह टूट चुका है। पोस्टमॉर्टेम और जांच की मांग परिवार ने मुखर रूप से की है।
बुनियादी सुविधाओं को ध्यान नहीं रखा
नवजात शिशुओं में हल्का पीलापन (न्यूबोर्न जौण्डिस) आम बात है, लेकिन जब बिलिरुबिन का स्तर बढ़ता है तो उसे रोकने के लिए फोटोथेरेपी, और गंभीर मामलों में एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन जैसे उपचार की आवश्यकता होती है। चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के मुताबिक जन्म के बाद नवजातों की निगरानी, समय पर जांच और यदि बिलिरुबिन बहुत बढ़ जाए तो तत्काल उपचार अनिवार्य है, वरना ब्रेन डैमेज (कर्निक्टेरस) तथा मृत्यु का जोखिम बन सकता है। परिवार का दावा है कि इन बुनियादी सावधानियों का पालन नहीं हुआ।
जांच सौंपी गई, कार्रवाई की जाएगी
मुख्य जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय मिश्रा ने कहा है कि पीड़ित परिवार की शिकायत मिलने पर स्त्री रोग विभाग को मामले की जांच सौंपी जा रही है। उन्होंने आश्वस्त किया कि जांच के परिणामों के आधार पर यदि चिकित्सकीय लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित डॉक्टर/अस्पताल के विरुद्ध अनुशासनिक और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।अस्पताल प्रशासन या डॉ. सोनल रिछारिया का तत्काल कोई आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं हुआ है; यदि अस्पताल की ओर से कोई बयान आता है तो उसे रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। परिवार ने बताया कि उन्होंने वितउंस शिकायत जिला चिकित्सा अधिकारी के पास दे दी है और आगे की कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं।इस दुखद घटना ने इलाके में गहरा शोक और नाराज़गी फैला दी है। पड़ोसी, रिश्तेदार और स्थानीय लोग परिजनों के साथ खड़े हैं और अभियोजनात्मक जांच की मांग कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की घनी निगरानी और प्रसवस्थलों पर मानकों के पालन की जरूरत इस घटना से फिर से स्पष्ट हो उठी है।कृ जिला चिकित्सालय की जांच रिपोर्ट अहम होगी; वह तय करेगी कि क्या चिकित्सीय मानक तोड़े गए या लापरवाही हुई।कृ नवजातों के पीलिया के मामलों में समय पर परीक्षण और फोटोथेरेपी उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया जाना चाहिए।कृ प्रसव केंद्रों पर नियमित ऑडिट, स्टाफ ट्रेनिंग और इमरजेंसी रेफरल प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करने की सलाह विशेषज्ञ देते आए हैं।परिवार की अपील है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और भविष्य में किसी और परिवार को इसी तरह का दुख न झेलना पड़े। इस दुखद प्रकरण की जांच जारी है; जैसे ही अधिक जानकारी मिलेगी, उसका विस्तृत लेखा-जोखा प्रकाशित किया जाएगा।
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