जबलपुर, – मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court) ने मुख्यमंत्री कोरोना योद्धा कल्याण योजना के तहत मुआवज़े के मामलों में एक अत्यंत मानवीय और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोरोना महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए जान गंवाने वाले कर्मचारियों के लिए कोविड पॉज़िटिव रिपोर्ट की बाध्यता खत्म की जाती है। जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि "कोरोनाकाल में रिपोर्ट नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए दी गई सेवा ही सबसे बड़ा प्रमाण है।"

 

तकनीकी कमी बताकर रोका गया था मुआवज़ा

यह महत्वपूर्ण फैसला दिवंगत कर्मचारी राजीव उपाध्याय के परिवार द्वारा दायर याचिका पर आया है। राजीव उपाध्याय को वर्ष 2020 में महामारी के शुरुआती चरण में कोविड ड्यूटी में लगाया गया था।मामले की जड़: कोविड ड्यूटी के दौरान ही राजीव उपाध्याय की कोविड टेस्ट होने से पहले ही हार्ट अटैक से मौत हो गई थी।राज्य सरकार का तर्क: चूंकि उनकी मृत्यु के समय की कोई कोविड पॉज़िटिव रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी, इसलिए राज्य सरकार ने तकनीकी आधार पर उनके परिवार को मुख्यमंत्री कोरोना योद्धा कल्याण योजना के 50 लाख रुपये के लाभ से वंचित कर दिया था।

 

HC का सख्त रुख: लाभ से वंचित करना अमानवीय

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के इस रवैये को अमानवीय और अन्यायपूर्ण बताते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब कर्मचारी को स्पष्ट रूप से कोविड-19 से संबंधित जोखिम भरी ड्यूटी पर तैनात किया गया था, तो यह मान लेना उचित है कि उन्हें यह संक्रमण या संबंधित तनाव उसी ड्यूटी के दौरान हुआ।

कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य लोगों को राहत देना होता है, न कि उन्हें कागजी औपचारिकताओं में फंसाकर परेशान करना। केवल इसलिए कि कर्मचारी का कोविड टेस्ट नहीं हो पाया या रिपोर्ट पॉज़िटिव नहीं आई, उनके परिवार को योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, जबकि यह स्पष्ट है कि उनकी मौत कोविड ड्यूटी के दौरान हुई।

 

लाभुकों के लिए उम्मीद की नई किरण

अपने फैसले में, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तत्काल आदेश दिया कि वह मृतक राजीव उपाध्याय के परिवार को बिना किसी विलंब के मुख्यमंत्री कोरोना योद्धा कल्याण योजना के तहत मिलने वाला पूरा लाभ प्रदान करे।हाई कोर्ट का यह फैसला उन सैकड़ों कोरोना योद्धाओं के परिवारों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्हें महामारी के दौरान रिपोर्टिंग और टेस्टिंग की कमी या मृत्यु के बाद की तकनीकी अड़चनों के कारण सरकारी मुआवज़े से दूर रखा गया था। इस निर्णय से अब ऐसे सभी पात्र परिवारों को न्याय मिलने की राह आसान हो गई है।