16 साल की 'फर्जी' छुट्टी पड़ी भारी: नौकरी से बर्खास्त, हाईकोर्ट ने SP रीवा को 96 घंटे में जालसाजी का FIR दर्ज करने का दिया निर्देश
जबलपुर/रीवा। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में, शिक्षाकर्मी ग्रेड-III की एक महिला याचिकाकर्ता की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने 16 साल (2002 से 2017) की अपनी लंबी अनुपस्थिति को मेडिकल अवकाश में बदलने और नौकरी पर बहाल करने की अपील की थी। न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत चिकित्सा प्रमाणपत्रों को प्रथम दृष्टया फर्जी मानते हुए न केवल याचिका खारिज की, बल्कि रीवा के पुलिस अधीक्षक (SP) को संबंधित जालसाजी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला (FIR) दर्ज करने का भी निर्देश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 1998 में शिक्षाकर्मी ग्रेड-III के रूप में हुई थी। 29 अक्टूबर 2002 को उसका स्थानांतरण किया गया, लेकिन 30 अक्टूबर 2002 को कार्यमुक्त होने के बाद उसने नई जगह पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया। वह सीधे 16 साल बाद यानी 2018 में ड्यूटी पर लौटने की गुहार लेकर सामने आई।अपनी 16 साल की अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए, याचिकाकर्ता ने एस.एस. मेडिकल कॉलेज, रीवा के मनोरोग विभाग के प्रमुख के नाम से दो प्रमाणपत्र पेश किए:बीमारी प्रमाण पत्र: 22 फरवरी 2006फिटनेस प्रमाण पत्र: 28 मार्च 2017
न्यायालय ने पकड़ी जालसाजी की जड़
न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने 15 साल के अंतराल के बावजूद दोनों प्रमाणपत्रों पर एक ही व्यक्ति के हस्ताक्षर, मुहर और हस्तलेख होने पर गंभीर संदेह व्यक्त किया। इस पर, कोर्ट ने एस.एस. मेडिकल कॉलेज के डीन, डॉ. सुनील अग्रवाल को शपथ पत्र दायर करने का निर्देश दिया।
डीन के शपथ पत्र से चौंकाने वाला खुलासा हुआ:डीन ने पुष्टि की कि साल 2009 से पहले मनोरोग विभाग (Psychiatry Department) एक स्वतंत्र विभाग के रूप में मौजूद नहीं था, बल्कि यह औषधि विभाग (Department of Medicine) के तहत एक इकाई मात्र था।इससे यह सिद्ध हो गया कि 22.02.2006 को 'मनोरोग विभाग प्रमुख' के रूप में जारी किया गया बीमारी प्रमाण पत्र स्पष्ट रूप से फर्जी है, क्योंकि उस तारीख को ऐसा कोई विभाग अस्तित्व में ही नहीं था।न्यायालय ने इस बात को रिकॉर्ड पर लिया कि 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी हस्ताक्षर, मुहर और हस्तलेख में कोई बदलाव नहीं है, जो दस्तावेजों के फर्जीवाड़े की पुष्टि करता है।
एसपी रीवा को 96 घंटे में FIR दर्ज करने का निर्देश
फर्जी दस्तावेज पेश करने की गंभीरता को देखते हुए, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया और आपराधिक कार्रवाई का निर्देश दिया:FIR का आदेश: कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, रीवा को निर्देश दिया कि याचिका में संलग्न पृष्ठ 16 और 17 पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के खिलाफ 96 घंटे के भीतर आपराधिक मामला (FIR) दर्ज किया जाए।जांच का विस्तार: न्यायालय ने जांच अधिकारी को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि यह पाया जाता है कि वर्तमान विभाग प्रमुख (डॉ. प्रदीप कुमार) ने इन प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, तो जांच का दायरा याचिकाकर्ता सहित अन्य सभी संदिग्ध व्यक्तियों की भूमिका तक बढ़ाया जाए।पालन रिपोर्ट: एसपी, रीवा को आदेश के पालन की रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर न्यायालय की रजिस्ट्री में प्रस्तुत करनी होगी।
16 साल की अनुपस्थिति 'सेवा का परित्याग'
याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज करते हुए, न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अत्यधिक संदिग्ध दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, इसलिए वह न्यायिक विवेक का लाभ पाने की हकदार नहीं है।उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 16 साल तक बिना किसी उचित और वैध कारण के ड्यूटी से अनुपस्थित रहना स्पष्ट रूप से 'सेवा का परित्याग' (Abandonment of Services) माना जाता है। न्यायालय ने कहा कि अनुपस्थिति इतनी लंबी है कि इस स्तर पर बहाली की मांग न्यायसंगत नहीं है। परिणामस्वरूप, याचिका को खारिज कर दिया गया।सरकार की तरफ से एडवोकेट सिद्वार्थ शुक्ला ने पक्ष रखा
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