आधे-अधूरे निर्णय से बढ़ी मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद भी कार्रवाई नहीं
आठवीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी अध्याय पर शिक्षा मंत्रालय की अदूरदर्शिता और अपरिपक्वता ने महज दो महीने में मोदी सरकार को दो बार बैकफुट पर धकेला है। पहले मंत्रालय ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विवादास्पद नियम मामले में मोदी सरकार को सियासी चक्रव्यूह मेंं उलझाया, जबकि इस विवाद ने सरकार को सीधे न्यायपालिका के कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह मामला इसलिए भी बहुत बड़ा हो गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने न सिर्फ इसे न्यायपालिका की छवि बिगाडऩे की सोची समझी साजिश माना है, बल्कि इस मामले में सरकार की कार्रवाई को लीपापोती करार दिया है।इस विवाद में शिक्षा मंत्रालय की उदासीनता एक बार फिर से सरकार पर भारी पड़ गई। शिक्षा मंत्रालय अगर विवाद के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई, बिक्री के लिए गई किताबों की वापसी, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इससे संबंधित उपलब्ध सामग्री को हटाने का फैसला करता तो विवाद इतना नहीं बढ़ता। इसके उलट मंत्रालय यूजीसी समानता नियम विवाद के तरह ही पूरे मामले को हल्के में लेता रहा। वह भी तब जब कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने बुधवार को ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कड़ा रुख जता कर विवाद के बड़ा बनने का साफ संकेत दे दिया था।
ऐसे बिगड़ती गई बात
बृहस्पतिवार को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा इसे न्यायपालिका पर हमला करार देते हुए मामले का स्वत: संज्ञान लेने के फैसले के बाद भी मंत्रालय मामले की गंभीरता को नहीं भांप पाया। इससे पहले बुधवार को ही सुनवाई से पहले कॉफी लाउंज में अन्य जजों के साथ बैठक कर इस विवाद पर चर्चा की थी। इस बैठक में सभी जजों ने इसे न्यायपालिका की छवि पर प्रहार माना था। बावजूद इसके मंत्रालय मामले की गंभीरता को नहीं भांप पाया। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विवाद के बाद एनसीईआरटी की ओर से दी गई सफाई में माफी शब्द का इस्तेमाल ही नहीं किया गया। मंत्रालय के इसी रवैये के कारण शुक्रवार को नाराज सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को प्रतीकात्मक और लीपापोती करार देते हुए मामले को खत्म करने से इंकार कर दिया।
घायल सुप्रीम कोर्ट किसकी लेगा बलि
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने हेड ऑन रोल्स की बात कही। जिस बैठक में पाठ्यक्रम में विवादास्पद अध्याय को शामिल करने का निर्णय लिया गया, उसका पूरा विवरण मांगा। शीर्ष अदालत ने जानना चाहा कि उस बैठक में कौन-कौन लोग उपस्थित थे। शीर्ष अदालत ने सारी रिपोर्ट्स आने के बाद कमेटी के गठन की बात की। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या शीर्ष अदालत उस बैठक में उपस्थित सभी लोगों की जिम्मेदारी तय करेगा?
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