मध्य प्रदेश बजट से आदिवासी समाज को उम्मीदें, लेकिन कुपोषण खत्म करने की चुनौती बरकरार
शहडोल: मध्य प्रदेश का बजट 18 फरवरी को विधानसभा में पेश होने जा रहा है. डिप्टी सीएम सह वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा वित्त वर्ष 2026-27 का वार्षिक बजट पेश करेंगे, जिस पर सबकी नजर रहेगी. इस बार का बजट कई मायनों में खास रहने वाला है. इसमें हर वर्ग के लिए क्या-क्या खास होगा, इस पर तो सबकी नजर है. खासकर आदिवासियों को क्या सौगात मिलेगी. साथ ही कुपोषण खत्म करने के लिए कितना बजट दिया जाएगा. क्या कुपोषण के लिए बजट बढ़ाया जाएगा?
मध्य प्रदेश का बजट और कुपोषण
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राकेश कुमार मालवीय पिछले कई सालों से सामाजिक संस्था विकास संवाद के साथ जुड़कर कुपोषण पर काम कर रहे हैं. वो बताते हैं कि मध्य प्रदेश में पोषण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. खासकर आदिवासी बच्चों में कुपोषण बहुत ज्यादा है. इस परिस्थिति में जरूरी ये हो जाता कि सरकार इन बच्चों को ध्यान में रखते हुए अच्छी योजनाएं लागू करे. बजट का आवंटन अधिक से अधिक करे और साल दर साल बढ़ाए, लेकिन स्थिति इससे ठीक उलट है."
बीते सालों में घटा पोषण बजट
वरिष्ठ पत्रकार राकेश कुमार बताते हैं, "2019 के बजट में बच्चों से संबंधित पोषण योजना का बजट आवंटन 1700 करोड़ था, जो साल 2023- 24 में करीब 1200 करोड़ रुपए रह गया. बच्चों के पोषण के लिए दिया जाने वाला बजट लगातार कम होता जा रहा है. सरकार ने एक बहुत अच्छी पहल करते हुए पोषण नीति बनाई थी, लेकिन उसके लिए पर्याप्त बजट आवंटन नहीं हुआ, जिससे उस पर कोई ठोस काम नहीं हो पाया है. प्रति बच्चा बजट आवंटन को बढ़ाकर 15 रुपए प्रति बच्चा किया जाना चाहिए. हम ये उम्मीद करते हैं कि आने वाले बजट में सरकार खासकर इन बच्चों को ध्यान रखेगी और बजट को बढ़ाएगी, ताकी आदिवासी बच्चों को भरपेट भोजन उपलब्ध हो सके."
मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति
देखा जाए तो मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है. परिवार स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कराए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के पांचवे चक्र में कम वजन वाले बच्चों के मामले में सबसे खराब स्थिति वाले जिलों की बात करें तो मध्य प्रदेश में बुरहानपुर 47.2 प्रतिशत के साथ टॉप पर बना हुआ है. दूसरे नंबर पर बालाघाट 44.9 फीसदी है. तीसरे नंबर पर कटनी 44.0 फीसदी है. खरगोन चौथे नंबर और झाबुआ पांचवें नंबर पर है. ये आंकड़े मध्य प्रदेश के 0 से 5 साल के कम वजन वाले बच्चों के हैं.
वजन के मामले में बेहतर जिले
मध्य प्रदेश में ही कम वजन वाले बच्चों के मामले में सबसे बेहतर स्थिति वाले जिले की बात करें तो मंदसौर नंबर वन है. इंदौर दूसरे नंबर और गुना तीसरे नंबर पर है. वहीं रायसेन चौथे नंबर और राजगढ़ पांचवें नंबर पर है.
ठिगने बच्चों की स्थिति
ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश में कुपोषण में ही ठिगने बच्चों के मामले में सबसे खराब स्थिति वाले जिलों में कटनी टॉप पर है, सतना दूसरे नंबर, झाबुआ तीसरे नंबर, शिवपुरी चौथे नंबर और बड़वानी पांचवें नंबर पर है.ठिगने बच्चों के मामले में सबसे बेहतर स्थिति वाले जिलों की बात करें तो जबलपुर टॉप पर है. वहीं भोपाल दूसरे नंबर पर और सीहोर तीसरे नंबर पर है. सिवनी चौथे नंबर और छिंदवाड़ा पांचवें नंबर पर है. ये सभी 5 वर्ष से कम आयु के ठिगने बच्चे हैं.
दुबले बच्चों की स्थिति
मध्य प्रदेश में कुपोषण में ही दुबले बच्चों की बात करें तो दुबले बच्चों के मामले में सबसे खराब स्थिति वाले जिलों में उज्जैन नंबर वन पर और धार दूसरे नंबर पर, हरदा तीसरे, बुरहानपुर चौथे नंबर और खरगोन 5 में नंबर पर है.दुबले बच्चों के मामले में सबसे बेहतर स्थिति वाले जिले में गुना पहले नंबर पर है. वहीं मुरैना दूसरे और भिंड तीसरे नंबर पर है. ग्वालियर चौथे और नीमच पांचवें नंबर पर है. यह सभी 5 वर्ष से कम उम्र के दुबले बच्चे हैं.
मध्य प्रदेश के 36 जिलों में गंभीर कुपोषण
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश देश के सबसे ज्यादा अनाज उत्पादन करने वाले तीन राज्यों में आता है. इसके बावजूद प्रदेश के लगभग हर जिले में कुपोषण और एनीमिया व्याप्त है. रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 36 जिलों में आज भी कुपोषण का स्तर 30 फीसदी से 47 फीसदी तक है.
पोषण को लेकर नहीं दिख रही गंभीरता
मध्य प्रदेश में एनएफएचएस-5 के अनुसार 0 से 5 वर्ष के कम वजन के बच्चे 33 फीसदी हैं. एनएफएचएस-4 में 42.8 प्रतिशत थे. एनएफएचएस- 5 के अनुसार मध्य प्रदेश के जिलों में बुरहानपुर और बालाघाट में क्रमशः 47.2 और 44.9 फीसदी के साथ जीरो से 5 वर्ष के बच्चों का वजन तय मानक से सबसे कम है.मंदसौर और इंदौर में सबसे कम क्रमशः 22.9 और 24.9% कुपोषण है. मध्य प्रदेश में जहां एक तरफ गुना, मुरैना और भिंड जिलों में कुपोषण के आंकड़े NFHS- 4 की तुलना में NFHS-5 की तुलना में बेहतर दिख रहे हैं. वहीं 5 जिले ऐसे भी हैं, जहां कुपोषण का स्तर बेहतर होने की बजाय और खराब हो गया जिसमें बालाघाट, बुरहानपुर, कटनी, सागर और उज्जैन शामिल हैं.
ठिगने बच्चों की बढ़ रही संख्या
एनएफएचएस-5 के अनुसार जो सर्वे हुआ है. उसके अनुसार ठिगने बच्चों के आंकड़ों में कुछ कमी तो दिख रही है, लेकिन इसके बाद भी प्रदेश के 9 जिले ऐसे हैं जिनमें ठिगने बच्चों का कुल प्रतिशत पहले से बढ़ गया है. ठिगने बच्चों में उन बच्चों को शामिल किया जाता है, जिनका कद उनकी उम्र के अनुसार बढ़ नहीं रहा है. मतलब की औसत कद से भी कम है. एनएफएचएस- 5 के अनुसार मध्य प्रदेश में 35.7 फीसदी बच्चों में ठिगनापन है. ये आंकड़े एनएफएचएस-3 में 50 फीसदी और एनएफएचएस-4 में 42 फीसदी था. चिंता का विषय ये भी है कि इन्हीं 14 में से 9 जिलों में एनएफएचएस-4 के बाद एनएफएचएस 5 में भी ठिगने बच्चों का प्रतिशत बढ़ा है. इसमें कटनी 49.5 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है.
क्यों होता है कुपोषण?
आखिर कुपोषण होता क्या है? इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कुपोषण बच्चों और बड़ों में भी होता है. बच्चों में होने वाला कुपोषण उनके पूरे जीवन को प्रभावित करता है. किशोरियों और महिलाओं में होने वाला कुपोषण भी गंभीर परिणाम देता है. क्योंकि इससे न केवल वे कमजोर होती हैं, बल्कि बच्चों के कुपोषित होने की आशंका भी बढ़ जाती है. शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार का लंबे समय तक न मिलने से जो स्थिति बनती है, वो कुपोषण की स्थिति है. संतुलित आहार मतलब केवल अनाज नहीं, बल्कि साथ में कोई भी दाल, सब्जी, खाने का तेल, दूध, कोई भी फल और यदि. परिवार अंडे खाता हो तो वह भी साथ में दे सकते हैं. कुपोषण के कारण बच्चों और महिलाओं का शरीर बीमारियों से लड़ नहीं पाता और वो आसानी से कई तरह की बीमारियों का शिकार बन जाते हैं.
आदिवासियों को बजट से क्या आस?
आदिवासी मामलों के जानकार चांद सिंह पट्टावी बताते हैं, "मध्य प्रदेश के आने वाले बजट से आदिवासी वर्ग के लोगों को बहुत उम्मीदें हैं. ये बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार मूलक बजट होना चाहिए. हालांकि, वो एक चिंता भी जाहिर करते हैं कि अभी तक जो बीजेपी सरकार में प्रदेश का बजट आया है. उसमें आदिवासियों के शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बजट में कटौती ही की गई है, जबकि इस बजट को घटाने की नहीं बल्कि बढ़ाने की जरूरत है. अभी भी समाज में बेरोजगारी की वजह से पलायन नहीं रुका है. कुपोषण चरम पर है. समाज में शिक्षा की भी कमी है और गरीबी भी व्याप्त है. ऐसे में इनका स्तर उठाने के लिए एक विशेष बजट की जरूरत है. इस बार के बजट में वो उम्मीद की जा रही है."
प्रत्याशियों की संपत्ति ने खींचा ध्यान, करोड़ों की दौलत का खुलासा
भोपाल से घोषणा: नई पीढ़ी पढ़ेगी ‘नर्मदा टाइगर’ राजा हिरदेशाह की कहानी
महिला आरक्षण पर बढ़ा विवाद: कांग्रेस बोली—PM बुलाएं सर्वदलीय बैठक
AAP के भीतर सियासी बयानबाजी तेज, Saurabh Bharadwaj का Raghav Chadha पर हमला
युद्ध का असर भारत तक: तारकोल महंगा, सड़क परियोजनाएं अटकीं
सात राज्यसभा सदस्यों की सदस्यता रद्द करने की उठाई मांग
सबूत कमजोर या जांच में खामी? केस पर उठे सवाल
बिश्केक में भारत-चीन रक्षा मंत्रियों की बैठक, Rajnath Singh ने जताई खुशी