ग्रीन कॉरिडोर बनाकर कराया गया त्वरित उपचार, मॉकड्रिल से परखी गई तैयारियां

जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल परिसर में उस समय अफरा-तफरी का माहौल बन गया, जब एक के बाद एक कई घायल सेना के जवानों को एंबुलेंस के माध्यम से अस्पताल लाया गया। सेना क्षेत्र से लेकर मेडिकल अस्पताल तक पूरे मार्ग को ग्रीन कॉरिडोर में तब्दील कर दिया गया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात था और आम लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई। अचानक बने इस हालात को देखकर अस्पताल परिसर में मौजूद लोग भी कुछ देर के लिए असमंजस में पड़ गए।

ग्रीन कॉरिडोर और सुरक्षा व्यवस्था
सेना क्षेत्र से मेडिकल अस्पताल तक बनाए गए ग्रीन कॉरिडोर को देखते हुए ट्रैफिक पूरी तरह नियंत्रित किया गया। पुलिस बल की तैनाती के चलते अस्पताल और आसपास के क्षेत्रों में कड़ी सुरक्षा रही, जिससे किसी भी तरह की अव्यवस्था न हो।

सूचना मिलते ही अस्पताल प्रशासन हरकत में आ गया। अपनी ड्यूटी पूरी कर घर पहुंच चुके डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मियों को तत्काल वापस बुलाया गया। इमरजेंसी वार्ड, ट्रॉमा सेंटर और ऑपरेशन थिएटर को अलर्ट मोड पर रखा गया। कुछ ही समय में पूरा मेडिकल अमला इलाज की तैयारियों में जुट गया। घायल जवानों को स्ट्रेचर पर लाकर तुरंत प्राथमिक उपचार दिया गया और उनकी स्थिति के अनुसार आगे की चिकित्सा प्रक्रिया शुरू की गई।

डॉक्टरों और स्टाफ की तत्परता
आपात सूचना मिलते ही अस्पताल के सभी प्रमुख विभाग सक्रिय कर दिए गए। ट्रॉमा सेंटर, इमरजेंसी, ओटी के साथ-साथ ब्लड बैंक और जांच इकाइयों को भी अलर्ट रखा गया, ताकि किसी भी स्थिति से निपटा जा सके। हालांकि बाद में यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई वास्तविक आपात स्थिति नहीं, बल्कि सेना और मेडिकल प्रशासन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक मॉकड्रिल थी। इस मॉकड्रिल का उद्देश्य किसी भी आपदा, आतंकी घटना या युद्ध जैसी स्थिति में घायलों के त्वरित उपचार, समन्वय और व्यवस्थाओं की जांच करना था। मॉकड्रिल के दौरान यह परखा गया कि सूचना मिलते ही प्रशासन, पुलिस, सेना और मेडिकल स्टाफ किस तरह से तालमेल बनाकर काम करता है।

आपात हालात से निपटने की मॉकड्रिल
मॉकड्रिल के माध्यम से यह देखा गया कि सीमित समय में किस प्रकार घायलों को अस्पताल पहुंचाया जाता है और इलाज की पूरी प्रक्रिया कितनी प्रभावी ढंग से संचालित होती है। इस अभ्यास का नेतृत्व वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. मयंक चंसौरिया ने किया। उनके मार्गदर्शन में डॉक्टरों की टीम ने घायल जवानों की स्थिति का आकलन किया, ट्रायेज सिस्टम के तहत गंभीर, सामान्य और हल्के घायलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा और उसी अनुसार इलाज की प्रक्रिया अपनाई। ब्लड बैंक, रेडियोलॉजी विभाग, लैब और फार्मेसी को भी तत्काल सक्रिय किया गया, ताकि किसी भी तरह की कमी न रहे।

पुलिस और सेना का समन्वय
मॉकड्रिल के दौरान ट्रैफिक पुलिस ने ग्रीन कॉरिडोर को सुचारु बनाए रखा, वहीं सिविल पुलिस ने अस्पताल परिसर की सुरक्षा संभाली। सेना के अधिकारियों ने पूरी प्रक्रिया पर नजर रखी और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। अभ्यास के बाद अधिकारियों द्वारा व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई और कुछ तकनीकी व प्रशासनिक बिंदुओं पर सुधार के सुझाव भी दिए गए। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि इस तरह की मॉकड्रिल बेहद आवश्यक है, क्योंकि वास्तविक आपात स्थिति में समय ही सबसे बड़ा कारक होता है। मॉकड्रिल के सफल समापन के बाद अस्पताल परिसर में स्थिति सामान्य हुई। आम लोगों को भी यह संदेश दिया गया कि घबराने की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि यह अभ्यास भविष्य की किसी भी चुनौती से निपटने की तैयारी का हिस्सा था।