श्राद्ध अनुष्ठानों में क्यों किया जाता है काले तिल का प्रयोग?
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है और सर्वपितृ अमावस्या पर ज्ञात-अज्ञात पितरों का श्राद्ध व तर्पण कर पितरों को विदा किया जाता है. सर्वपितृ अमावस्या (पितृपक्ष की अंतिम तिथि) का महत्व है कि इस दिन संपूर्ण पितरों का श्राद्ध-पिंडदान किया जा सकता है, चाहे किसी विशेष तिथि का श्राद्ध करना छूट गया हो. पितृपक्ष के दौरान काले तिल का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है. पितरों को तर्पण समेत किसी भी कार्य में काले तिल सबसे पहले देखे जाते हैं. पितरों के कार्यों में इस विधि में तिल का प्रयोग आवश्यक माना गया है. आइए जानते हैं श्राद्ध अनुष्ठानों में क्यों किया जाता है काले तिल का प्रयोग.
इसलिए पितरों के कार्यों में होता है काले तिल का प्रयोग
गरुड़ पुराण के अनुसार, काले तिल और कुशा दोनों की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को अपने अत्याचारों से पीड़ित किया तो भगवान विष्णु अत्यंत क्रोधित हुए. उस समय उनके शरीर से पसीने की बूंदें निकलीं, जो पृथ्वी पर गिरकर काले तिल में परिवर्तित हो गईं. यही कारण है कि काले तिल को दिव्य और पवित्र माना जाता है. चूंकि भगवान विष्णु पितरों के आराध्य माने जाते हैं, इसलिए पितृ तर्पण में काले तिल का विशेष महत्व है.
काले तिल से पितर होते हैं प्रसन्न
मान्यता है कि काले तिल में पितरों को आकर्षित करने और तर्पण स्वीकार करवाने की शक्ति होती है. जब जल के साथ काले तिल अर्पित किए जाते हैं, तो पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं. यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृ दोष से जुड़े ग्रह शनि, राहु और केतु को शांत करने के लिए काले तिल का उपयोग किया जाता है. श्राद्ध के दौरान काले तिल अर्पित करने से इन ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और परिवार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. माना जाता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.
सफेद तिल का शुक्र से संबंध
यहां यह समझना आवश्यक है कि श्राद्ध और तर्पण में केवल काले तिल का उपयोग होता है, सफेद तिल का नहीं. ज्योतिष में सफेद तिल का संबंध चंद्रमा और शुक्र से माना जाता है. इसका उपयोग शुभ कार्यों, प्रसाद और सुख-समृद्धि से जुड़े कर्मकांडों में होता है. जबकि पितृ कर्म गंभीर और आत्मा की शांति से जुड़ा अनुष्ठान है, इसलिए उसमें काले तिल को ही प्रधानता दी जाती है.
काले तिल के साथ कुश का भी प्रयोग
श्राद्ध विधि में काले तिल के साथ-साथ कुशा का प्रयोग भी आवश्यक है. कुशा को पवित्र माना गया है क्योंकि इसकी जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और शीर्ष पर भगवान शिव का वास माना जाता है. इस कारण पितृ कर्म में कुशा का प्रयोग अनिवार्य है. हालांकि, पूजा-पाठ जैसे शुभ कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाता है.
AI समिट में हंगामे के खिलाफ BJP का हल्ला बोल, कांग्रेस ऑफिस के सामने प्रदर्शन
2600 करोड़ की लागत से बन रही सड़क, निर्माण से पहले लगी धंसने, ओवरब्रिज के दीवारों पर क्रेक
बिलासपुर में रेरा की बड़ी कार्रवाई, ‘फॉर्च्यून एलिमेंट्स’ पर 10 लाख जुर्माना
छत्तीसगढ़: बजट सत्र में पेश हो सकता है धर्मांतरण विधेयक, गृह मंत्री विजय शर्मा ने दी जानकारी
CG SIR: छत्तीसगढ़ में कटे 25 लाख वोटर्स के नाम, फाइनल वोटर लिस्ट जारी, जानें कैसे चेक करें अपना नाम
CG – चाकूबाजी से दहली न्यायधानी : इस दिग्गज कांग्रेस नेता के बेटे पर हुआ जानलेवा हमला, युवकों ने कई बार किया चाक़ू से वार
टोल प्लाजा पर अब नहीं चलेगा कैश, 1 अप्रैल से छत्तीसगढ़ में भी लागू होगा नियम
ब्रेकिंग : पूर्व मंत्री कवासी लखमा बजट सत्र में होंगे शामिल, जानिए किन शर्तों का करना होगा पालन
फेल रही ट्रंप की टैरिफ नीति?: अमेरिका ने लगाया भारी शुल्क, फिर भी भारत से व्यापार घाटा 58.2 अरब डॉलर तक बढ़ा